इजरायल की लेबनान में खींची गई पीली रेखा का असली सच

इजरायल की लेबनान में खींची गई पीली रेखा का असली सच

इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम की खबरें अभी ठंडी भी नहीं हुई थीं कि 'येलो लाइन' या पीली रेखा का शोर मच गया। अगर आपको लगता है कि ये सिर्फ नक्शे पर खिंची कोई साधारण लकीर है, तो आप गलती कर रहे हैं। ये इजरायल का वो अल्टीमेटम है जिसने लेबनान की संप्रभुता और हिजबुल्लाह की मौजूदगी के बीच एक खतरनाक दीवार खड़ी कर दी है। सीधे शब्दों में कहें तो इजरायल ने साफ कर दिया है कि अगर किसी ने इस पीली रेखा को पार करने की जुर्रत की, तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे।

गाजा में महीनों तक चले खूनी संघर्ष के बाद अब सबका ध्यान लेबनान सीमा पर टिक गया है। युद्धविराम का मतलब ये कतई नहीं है कि इजरायल ने हथियार डाल दिए हैं या वो अब शांत बैठकर तमाशा देखेगा। बल्कि हकीकत इसके उलट है। इजरायल ने अपनी नई सैन्य रणनीति के तहत इस पीली रेखा को एक सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। ये रेखा लेबनान के अंदर उन इलाकों को चिन्हित करती है जहां इजरायली सेना किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि देखते ही हमला करने का हक सुरक्षित रखती है।

क्या है ये पीली रेखा और क्यों इससे डरा हुआ है लेबनान

पीली रेखा कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है। ये इजरायल द्वारा तय किया गया एक 'नो-गो जोन' जैसा इलाका है। इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि दक्षिण लेबनान के कुछ खास हिस्सों में हिजबुल्लाह के लड़ाकों या उनके हथियारों की मौजूदगी उन्हें मंजूर नहीं। ये रेखा लिटानी नदी के आसपास के उन सामरिक बिंदुओं को कवर करती है जहां से इजरायल के उत्तरी शहरों पर रॉकेट दागना आसान होता है।

इतिहास गवाह है कि इजरायल जब भी इस तरह की रेखाएं खींचता है, तो उसके पीछे एक गहरी रणनीति होती है। 2006 के युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव 1701 आया था। उसमें भी यही कहा गया था कि लिटानी नदी के दक्षिण में सिर्फ लेबनानी सेना और UN के शांतिदूत रहेंगे। लेकिन हिजबुल्लाह ने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब इजरायल ने अपनी 'येलो लाइन' के जरिए ये संदेश दिया है कि वो UN के भरोसे नहीं बैठने वाला। वो खुद अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

इजरायली रणनीति में आया ये बड़ा बदलाव

बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार इस बार किसी भी तरह के ढुलमुल रवैये के मूड में नहीं दिखती। गाजा में हमास के साथ जो हुआ, उससे इजरायल ने सीखा है कि दुश्मन को फिर से संगठित होने का मौका देना खुदकुशी के बराबर है। पीली रेखा दरअसल एक प्रो-एक्टिव डिफेंस मैकेनिज्म है।

इजरायल के सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि हिजबुल्लाह अपने बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने की कोशिश करेगा। वो सुरंगें खोदेगा और रिहायशी इलाकों में मिसाइलें छिपाएगा। पीली रेखा उन सभी गतिविधियों के खिलाफ एक चेतावनी है। अगर कोई ट्रक उस इलाके में संदिग्ध सामान ले जाता दिखता है या कोई ग्रुप वहां बंकर बनाने की कोशिश करता है, तो इजरायल बिना किसी चेतावनी के बमबारी कर सकता है। ये 'शूट ऑन साइट' जैसी स्थिति है, बस फर्क इतना है कि ये जमीन पर नहीं बल्कि आसमान से नजर रखी जा रही है।

युद्धविराम के बावजूद तनाव कम क्यों नहीं हो रहा

बहुत से लोगों को लग रहा था कि सीजफायर होते ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा। ऐसा सोचना बचकाना है। युद्धविराम सिर्फ बड़े हमलों को रोकने का एक जरिया होता है, ये शांति का परमानेंट सर्टिफिकेट नहीं है। लेबनान की सरकार और वहां की सेना इस पीली रेखा को अपनी अखंडता पर हमला मानती है। लेकिन सच तो ये है कि लेबनानी सेना के पास हिजबुल्लाह को रोकने की न तो ताकत है और न ही इच्छाशक्ति।

इजरायल का तर्क सीधा है। वो कहता है कि अगर लेबनान अपनी धरती का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए होने दे रहा है, तो इजरायल को अपनी रक्षा के लिए सीमा पार कदम उठाने पड़ेंगे। ये पीली रेखा एक तरह का बफर जोन है जो इजरायली नागरिकों को हिजबुल्लाह के सीधे हमलों से बचाने के लिए बनाया गया है। इसमें किसी भी तरह की नरमी बरतने का मतलब है 7 अक्टूबर जैसी घटना को फिर से दावत देना।

पीली रेखा के पीछे का भूगोल और सामरिक महत्व

दक्षिण लेबनान का भूगोल पहाड़ियों और घाटियों से भरा है। ये इलाका गोरिल्ला वॉरफेयर के लिए जन्नत माना जाता है। हिजबुल्लाह सालों से इन्हीं पहाड़ियों का फायदा उठाकर इजरायल की नाक में दम करता आया है। पीली रेखा उन ऊंचाइयों को कवर करती है जहां से इजरायल की गैलिली घाटी पर सीधी नजर रखी जा सकती है।

  1. निगरानी चौकियां: इजरायल ने इन इलाकों में हाई-टेक सेंसर्स और ड्रोन्स तैनात किए हैं।
  2. सप्लाई लाइन काटना: सीरिया से आने वाले हथियारों की खेप अक्सर इसी रास्ते से हिजबुल्लाह के ठिकानों तक पहुंचती है। पीली रेखा इस सप्लाई चेन को तोड़ने का काम करेगी।
  3. मनोवैज्ञानिक दबाव: ये रेखा लेबनानी नागरिकों को भी ये अहसास कराती है कि हिजबुल्लाह के साथ खड़े होने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय का इस पर क्या रुख है

अमेरिका और यूरोपीय देश हमेशा की तरह संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वो एक तरफ इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन करते हैं, तो दूसरी तरफ लेबनान में मानवीय संकट और संप्रभुता की दुहाई देते हैं। लेकिन इजरायल को पता है कि जब बात उसकी सुरक्षा की आएगी, तो कोई भी देश उसके लिए लड़ने नहीं आएगा।

यही वजह है कि इजरायल ने इस बार अपनी शर्तें खुद लिखी हैं। पीली रेखा अंतरराष्ट्रीय कानूनों की किताबों में भले ही न हो, लेकिन जमीन पर इसकी धमक साफ सुनाई दे रही है। ये रेखा बताती है कि इजरायल अब 'रिएक्टिव' होने के बजाय 'प्री-एम्प्टिव' हो चुका है। यानी हमला होने का इंतजार करने से बेहतर है कि हमले की तैयारी को ही जड़ से मिटा दिया जाए।

क्या ये स्थायी शांति की ओर एक कदम है

ईमानदारी से कहूं तो इसका जवाब 'ना' है। पीली रेखा शांति का रास्ता नहीं बल्कि एक और युद्ध की जमीन तैयार कर रही है। हिजबुल्लाह कभी भी इस पाबंदी को स्वीकार नहीं करेगा। वो आज नहीं तो कल इस रेखा को चुनौती जरूर देगा। और जिस दिन वो ऐसा करेगा, लेबनान एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा होगा।

इजरायल के लिए ये रेखा उसकी 'रेड लाइन' से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर वो अपनी पीली रेखा की रक्षा नहीं कर पाया, तो उसकी साख मिट्टी में मिल जाएगी। ये सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, ये इजरायल की नई रक्षा नीति का लिटमस टेस्ट है।

अगर आप क्षेत्र की भू-राजनीति को समझना चाहते हैं, तो इन घटनाक्रमों पर नजर रखें। लेबनान की सेना को मजबूत करना या हिजबुल्लाह को निहत्था करना ही एकमात्र रास्ता दिखता है, जो फिलहाल नामुमकिन नजर आता है। तब तक ये पीली रेखा जलते हुए रेगिस्तान में खींची गई एक ऐसी लकीर बनी रहेगी जो कभी भी आग की लपटों में बदल सकती है। इजरायल के अगले कदम अब इस बात पर निर्भर करेंगे कि लेबनान के आसमान में उड़ते उसके ड्रोन्स को उस पीली रेखा के पार क्या हलचल दिखती है।

अगले कुछ हफ्ते काफी अहम होने वाले हैं। नजर इस बात पर रखनी होगी कि क्या लेबनानी सेना वाकई उन इलाकों का कंट्रोल अपने हाथ में लेती है या फिर हिजबुल्लाह चुपके से अपनी पीली रेखा पार करने की पुरानी आदत को दोहराता है। अगर आप लेबनान और इजरायल के बीच के इस तनाव को करीब से देख रहे हैं, तो दक्षिण लेबनान के नक्शे को गौर से देखना शुरू कर दीजिए। वहीं छिपे हैं आने वाले संकट के सारे जवाब।

EG

Emma Garcia

As a veteran correspondent, Emma Garcia has reported from across the globe, bringing firsthand perspectives to international stories and local issues.