जब गोलियों की गूंज मासूमों की चीखों को दबा दे, तब खामोशी सबसे बड़ा अपराध बन जाती है। आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी पीओके की ज़मीन पर जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ स्थानीय असंतोष नहीं है, बल्कि बुनियादी मानवाधिकारों का गला घोंटने की एक सुनियोजित कोशिश है। हाल ही में यूके की संसद में पीओके हिंसा का मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया, जहां पाकिस्तानी फौज की क्रूरता और निर्दोष नागरिकों पर हुई गोलीबारी की तीखी आलोचना हुई। करीब 40 निर्दोष नागरिकों की जान जाने के बाद पूरी दुनिया का ध्यान इस सुलगते हुए इलाके पर गया है।
पीओके में सुलगता असंतोष और पाकिस्तानी सेना का दमन चक्र
आप जब भी सीमा पार के हालात पर गौर करते हैं, तो एक बात साफ नज़र आती है। वहां की आवाम पाकिस्तानी हुकूमत और सेना के अत्याचारों से तंग आ चुकी है। बिजली के बढ़े हुए दाम, भारी टैक्स और बुनियादी अधिकारों की मांग करने वाले नागरिकों पर सीधी गोलियां बरसाई गईं। क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना कोई गुनाह है? वहां की फौज ने साबित कर दिया है कि उनके लिए असहमति की आवाज़ का मतलब सिर्फ मौत है।
ब्रिटिश संसद में इस मुद्दे का गूंजना इस बात का सुबूत है कि स्थानीय लोगों की चीखें अब सरहदें पार कर चुकी हैं। मानवाधिकार संगठनों ने इस बर्बरता की कड़ी निंदा की है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ बयानों से उन 40 जिंदगियों को वापस लाया जा सकता है जो पाक फौज की गोलीबारी का शिकार हुईं? बिल्कुल नहीं।
क्यों दबाई जा रही है अवाम की आवाज
पाकिस्तान लंबे समय से इस बात को छिपाने की कोशिश करता रहा है कि पीओके के भीतर क्या चल रहा है। इंटरनेट सेवाओं को बंद करना, पत्रकारों को रिपोर्टिंग से रोकना और विरोध प्रदर्शनकारियों पर देशद्रोह के झूठे मुकदमे लादना वहां का आम चलन बन चुका है।
- प्रदर्शनकारियों पर सीधे ऑटोमैटिक हथियारों से फायरिंग की गई।
- घायलों को समय पर इलाज मिलने से रोका गया।
- स्थानीय नेतृत्व को या तो गिरफ्तार कर लिया गया या वे भूमिगत होने पर मजबूर हैं।
यह रवैया साफ दिखाता है कि पाकिस्तानी हुक्मरानों को अपने ही नागरिकों के जीवन से ज्यादा अपनी सत्ता की चिंता है। जब लोग रोटी और हक मांगते हैं, तो उन्हें गोलियां दी जाती हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ती बेचैनी
यूके की संसद में इस संगीन मुद्दे पर हुई बहस ने पाकिस्तान की पोल खोलकर रख दी है। ब्रिटिश सांसदों ने वहां हो रहे मानवाधिकारों के हनन पर गहरी चिंता जताई। यह सिर्फ एक देश की संसद की बात नहीं है; दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों को अब आगे आना होगा।
जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान पर कड़े प्रतिबंध नहीं लगाता, तब तक वहां की सेना का यह खूनी खेल थमेगा नहीं। पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था की बदहाली से ध्यान भटकाने के लिए अक्सर दमनकारी नीतियों का सहारा लेता है, लेकिन इस बार जनता झुकने को तैयार नहीं है।
जमीनी हकीकत और आगे की राह
वहां के हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। लोग गुस्से में हैं और सड़कों पर उतरने से डर नहीं रहे हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी जान की कीमत चुकानी पड़े। यह जज्बा बताता है कि डर की यह दीवार अब दरकने लगी है।
हमें यह समझना होगा कि पीओके में बहने वाला खून सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है। हर मरने वाले के पीछे एक परिवार है, एक उम्मीद है। अगर वैश्विक मंच खामोश रहे, तो यह बर्बरता और बढ़ेगी। इस जुल्म के खिलाफ हर मंच पर आवाज उठाना जरूरी है, ताकि पाक फौज को यह अहसास हो सके कि उनके काले कारनामों पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।